An Incomplete Love Story

An Incomplete Love Story

आज फिर से तुम्हे देखकर दिल अन्दर ही अन्दर रो दिया, वह महज़ दस कदम नहीं अब वह दस मील जैसा लग रहा था। न चाहकर भी तुम्हे जाने दिया, मगर एक बार सिर्फ एक बार उस नज़र से देख लेती तो शायद तुम्हे वह उत्तर भी मिल जाता जिसे तुम अक्सर मुझ से पुछा करती थी।

तुम्हारी ग़लतफ़हमियों ने हमे कहाँ से कहाँ लाकर खड़ा कर दिया। यह वक़त पन्दरह महीने नहीं, मेरे लिए तो मगर ये पंद्रह सौ साल जैसा था।

तुम जानना चाहती थी न मेरी बेवफ़ाई की वज़ह? तो सुनो, मुझे आज भी याद है जब तुमने कहा था की मेरे भाई के दोस्त क्या बोलेंगे और वो पापा की पगड़ी, जिसे रोज़ वो काम से आकर मुझे देते थे संदूक पर रखने के लिए, उस पर भला मैं कैसे दाग़ लगने दूँ ?

ख़ैर एक भाई होने के नाते मुझे ख़बर थीं भाई की ज़िम्मेदारियाँ क्या होती हैं और मैंने पापा को भी देखा है छोटी की शादी के लिए सेविंग्स करते और कहते हुए “मेरी लाडो की शादी धूम धाम से करूँगा”

लिहाज़ा तुम यह बात ना समझो तो ही बेहतर है, मुझे बेवफा ही रहने दो अगर तुम्हे यह बात पता चली तो शायद तुम अपने आप को कभी माफ़ ना कर पाओ।

सच कहा तुमने की अब तुम्हे आदत तो डालनी ही होगी मेरे बिना जीने की, है न …

Leave a Reply